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रविवार, 6 जून 2010

ग्रीष्मकालीन भिंडी उत्पादन की उन्नत तकनीक

ग्रीष्मकालीन सब्जियों में भिंडी का प्रमुख स्थान है। ग्रीष्मकाल में भिंडी की अगेती फसल लगाकर किसान भाई अधिक लाभ अर्जित कर सकते है। मुख्य रुप से भिंडी में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट खनिज लवणों के अतिरिक्त विटामिन ‘ए’, ‘सी’ थाईमीन एवं रिबोफ्लेविन भी पाया जाता है। भिंडी के फल में आयोडीन की मात्रा अधिक होती है। भिंडी का फल कब्ज रोगी के लिए विशेष गुणकारी होता है। इस लेख में ग्रीष्मकालीन  भिंडी की उत्पादन तकनीक की विवेचना की गयी हैः-
जलवायु एवं भूमि की तैयारीः- भिंडी के उत्पादन हेतु गर्म मौसम अनुकुल होता है। बीजों के अंकुरण हेतु 20 सेंटीग्रेड से कम का तापमान प्रतिकूल होता है। 42ñ सेंटीग्रेड से अधिक तापमान पर फूल का परागण नहीं होता है एवं फूल गिर जाते है। 
सामान्यतः भिंडी की खेती सभी प्रकार की भूमियों पर की जा सकती है परन्तु हल्की दोमट मिट्टी जिसमें पर्याप्त मात्रा में जीवांश उपलब्ध हो एवं उचित जल निकास की सुविधा हो, भिंडी की खेती हेतु श्रेष्ठ होती हैं। भूमि की दो-तीन बार जुताई कर भूरभूरा कर तथा पाटा चलाकर समतल कर लेना चाहिए।
उन्नत किस्में- अर्का अभय, अर्का अनामिका, परभणी क्रांति, पूसा-ए-4, वर्षा उपहार,
बीज एवं बीजोपचारः- ग्रीष्मकालीन फसल हेतु 18-20 कि.ग्रा. बीज एक हेक्टर बुवाई के लिए पर्याप्त होता है जबकि वर्षाकालीन फसल में अधिक बढ़वार की कारण 12-15 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्टर उपयोग करना चाहिए। ग्रीष्मकालीन भिंडी के बीजों को बुवाई के पूर्व 12-24 घंटे तक पानी में डुबाकर रखने से अच्छा अंकुरण होता है। बुवाई के पूर्व भिंडी के बीजों को 3 ग्राम थायरम या कार्बेन्डाजिम प्रति किलो बीजदर से उपचारित करना चाहिए। संकर किस्मों के लिए 5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर की बीजदर पर्याप्त होती है।
बुवाईः- ग्रीष्मकालीन भिंडी की बुवाई फरवरी-मार्च में की जाती है। फिर भी अगेती फसल हेतु छत्तीसगढ़ क्षेत्र में 15 जनवरी के बाद भी बुवाई की जा सकती हे। यदि भिंडी की फसल लगातार लेनी है तो तीन सप्ताह के अंतराल पर फरवरी से जुलाई के मध्य अलग-अलग खेतों में भिंडी की बुवाई की जा सकती है। 
 ग्रीष्मकालीन भिंडी की बुवाई कतारों में करनी चाहिए। कतार से कतार दूरी 25-30 सें.मी. एवं कतार में पौधे की मध्य दूरी 15-20 से.मी. रखनी चाहिए। वर्षाकालीन भिंडी के लिए कतार से कतार दूरी 40-45 सें.मी. एवं कतारों में पौधे की बीच 25-30 सें.मी. का अंतर रखना उचित रहता है।
पोषण प्रबंधनः- भिंडी की बुवाई के दो सप्ताह पूर्व 250-300 क्विंटल सड़ा हुआ गोबर खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। प्रमुख तत्वों में नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश क्रमशः 60 कि.ग्रा., 30 कि.ग्रा. एवं 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर की दर से मिट्टी में देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के पूर्व भूमि में देना चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा को दो भागों में 30-40 दिनों के अंतराल पर देना चाहिए।
जलप्रबंधनः- यदि भूमि में पर्याप्त नमी न हो तो बुवाई के पूर्व एक सिंचाई करनी चाहिए। गर्मी के मौसम में प्रत्येक पांच से सात दिन के अंतराल पर सिंचाई आवश्यक होती है। बरसात में आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए तथा अतिवृष्टि के समय उचित जलनिकास प्रबंध करना चाहिए।
निदाई-गुड़ाईः- नियमित निंदाई-गुड़ाई कर खेत को खरपतवार मुक्त रखना चाहिए। बोने के 15-20 दिन बाद प्रथम निंदाई-गुड़ाई करना जरुरी रहता है। खरपतवार नियंत्रण हेतु रासायनिक नींदानाशकों का भी प्रयोग किया जा सकता है। बासालिन को 1.2 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व को प्रति हेक्टर की दर से पर्याप्त नम खेत में बीज बोने के पूर्व मिलाने से प्रभावी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है।
फल की तोड़ाई एवं उपजः- किस्म की गुणता के अनुसार 45-60 दिनों में फलों की तुड़ाई प्रारंभ की जाती है एवं 4 से 5 दिनों के अंतराल पर नियमित तुड़ाई की जानी चाहिए। ग्रीष्मकालीन भिंडी फसल में उत्पादन 60-70 क्विंटल प्रति हेक्टर तक होता है।
पौध संरक्षणः- भिंडी के प्रमुख रोग पीत शिरा मौजक एवं चूर्णिल आसिता एवं नुकसानदायक कीट प्ररोेह एवं फल छेदक तथा जैसिड है।
पीत शिरा रोगः- यह भिंडी की फसल में नुकसान पहुचाने वाला प्रमुख रोग है। इस रोग के प्रकोप से सर्वप्रथम पत्तियों की शिराएं पीली पड़ने लगती है। तत्पश्चात पूरी पत्तियाँ एवं फल भी पीले रंग के हो जाते है पौधे की बढ़वार रुक जाती है। वर्षा ऋतु में इस रोग का संक्रमण अधिक होता है।
 सर्वप्रथम इस रोग के लक्षण वाले पौधे दिखाई देते ही उन्हें उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए। यह विषाणु जनित रोग सफेद मक्खी कीट द्वारा स्वस्थ पौधों में फैलाया जाता है। अतः रोग संवाहक कीट के नियंत्रण हेतु आक्सी मिथाइल डेमेटान 1 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से रोग का प्रसारण कम होता है। पीतशिरा रोग प्रतिरोधी किस्मों जैसे अर्का अभय, अर्का अनामिका, परभणी क्रांति इत्यादि का चुनाव करना चाहिए। फसल के चारों ओर 2-3 कतार मक्का बोने से भी रोग का फैलाव नियंत्रित किया जा सकता है।
चूर्णिल आसिताः- इस रोग में भिंडी की पुरानी निचली पत्तियों पर सफेद चूर्ण युक्त हल्के पीले धब्बे पड़ने लगते है। ये सफेद चूर्ण वाले धब्बे काफी तेजी से फैलते है। इस रोग का नियंत्रण न करने पर पैदावार 30 प्रतिशत तक कम हो सकती है। इस रोग के नियंत्रण हेतु घुलनशील गंधक 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर 2 या 3 बार 12-15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।
प्ररोह एवं फल छेदकः- इस कीट का प्रकोप वर्षा ऋतु में अधिक होता है। प्रारंभिक अवस्था में इल्ली कोमल तने में छेद करती है जिससे तना सूख जाता है। फूलों पर इसके आक्रमण से फल लगने के पूर्व फूल गिर जाते है। फल लगने पर इल्ली छेदकर उनको खाती है जिससे फल मुड़ जाते हैं एवं खाने योग्य नहीं रहते है।
जैसिडः- ये सुक्ष्म आकार के कीट पत्तियों, कोमल तने एवं फल से रस चूसकर नुकसान पहुंचाते है।
 फल छेदक के द्वारा आक्रमण किये गये फलों एवं तने को काटकर नष्ट कर देना चाहिए। क्विनॉलफास 25 ई.सी. 1.5 मिली लीटर या इंडोसल्फान 1.5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी की दर से कीट प्रकोप की मात्रा के अनुसार 2-3 बार छिड़काव करने से जैसिड एवं फल प्ररोह छेदक कीटों का प्रभावी नियंत्रण होता है। फल बनने के उपरांत कीट प्रकोप होने पर ‘फेनवेलरेट’ 0.5 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर उपर्युक्त बनाये कीटनाशक के साथ अदल-बदल कर प्रयोग करें।

1 टिप्पणियाँ:

अनुनाद सिंह 7 जून 2010 को 9:00 am  

आजकल ताजा और शुद्ध शब्जियाँ भी नहीं मिलतीं। इन भिण्डियों को कच्चा देखकर ही मुंह में पानी आ रहा है।

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